बिहार विधानसभा चुनाव 2020 : बिहार में पोस्टर वार से राजनितिक हलकों में छिड़ी बहस

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पिछले दिनों, जदयू द्वारा आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2020 को ध्यान में रखकर पोस्टर जारी किया गया, जिसमे लिखा था कि ‘क्यों करें विचार ठीके तो हैं नीतीश कुमार‘। बाद में राजद ने भी पोस्टर जारी कर जदयू पर निशाना साधा। राजद ने अपने पोस्टर में लिखा कि “कर लिया है विचार, हमें चाहिए तेजस्वी सरकार“। रंग-बिरंगे बैकग्राऊंड में यह पोस्टर लोगो का ध्यान बरबस ही अपनी ओर खींच रही है। राजद ने फेसबुक पर भी एक कविता लिखकर सत्तापक्ष पर हमला बोला है। इसके साथ ही राज्य में आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के मद्देनज़र चुनावी चौसर पूरी तरह बिछती नज़र आ रही है।

जदयू के पोस्टर पर उपमुख्यमंत्री सुशिल कुमार मोदी का पलटवार

जदयू द्वारा जारी पोस्टर के प्रत्युत्तर में सुशिल मोदी ने लिखी कि “राज्य में विधानसभा के चुनाव होने में जब एक साल से ज्यादा वक्त बचा है, तब एनडीए के लिए यह चुनावी मोड में आने का नहीं, कार्यकाल की शेष अवधि में विकास के ज्यादा से ज्यादा काम करने का समय है।

राजनितिक हलकों में छिड़ी गहमागहमी

सुशील मोदी के ट्वीट आते ही सत्ता के गलियारों में चर्चा चल पड़ी कि भाजपा और जदयू के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रही है। हाल ही में अनेक मुद्दों पर जदयू और भाजपा में अंतरकलह स्पष्ट दिखी है। बात चाहे अनुच्छेद 370 की या असम NRC की, दोनों दलों में सामंजस्य की कमी दिखी है। तीन तलाक़ के मुद्दे पर भी दोनों दलों में स्पष्ट मतभेद दिखी थी। कयास ये भी लगाईं जा रही है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मुख्यमंत्री का पद अपने पास रखना चाहती है।

इसके लिए भाजपा 2014 के लोकसभा चुनाव का तर्क दे रही है, जब भाजपा जदयू ने अलग होकर चुनाव लड़ी थी और जदयू लोकसभा की मात्र दो सीटें जीत पाई थी। एक तथ्य यह भी है कि 2014  की लोकसभा चुनाव जहां जदयू ने अकेले लड़ी थी, वही भाजपा ने राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (रालोसपा) और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी थी।

भाजपा और जदयू में मतभेद की वास्तविकता

कहीं न कहीं भाजपा और जदयू में मुख्यमंत्री पद को लेकर काफी तकरार है। इसकी एक वजह दोनों दलों में गठबंधन के बावजूद मुख्यमंत्री पद का लगातार जदयू के पक्ष में रहना भी है। इन दोनों दलों को एंटी इंकम्बेंसी से होने वाली नुकसान का भी डर है, जो की नितीश कुमार की राजनीती के लिए नुकसानदेह प्रतीत हो रही है। तमाम विपक्षी दल भाजपा से अधिक जदयू के सर्वेसर्वा नितीश कुमार पर अधिक हमलावर नज़र आ रहे है।

विपक्ष के कुछेक नेताओं को छोड़ दे तो भाजपा के खिलाफ बयानबाजी से सभी बड़े नेता बचते नज़र आ रहे है। फिलहाल, केंद्रीय कैबिनेट में स्थान पाने की रस्साकस्शी को छोड़ दे तो अन्य सभी मामले कही न कही अल्पसंख्यकों से जुडी हुई नज़र आती है। बात चाहे अनुच्छेद 370 की हो या असम NRC (National Register of Citizens ) की या फिर तीन तलाक़ की, इन सभी मुद्दों पर ये दोनों दल विपरीत दिशा में चलते नज़र आते है। अल्पसंख्यकों से जुड़े कुछ प्रस्ताव तो जदयू के राजयसभा से वाकआउट कर जाने के कारण राजयसभा से पारित हो पाए, ऐसा विपक्ष का आरोप है। वरना राजयसभा में पहले से ही अल्पमत वाली भाजपा के लिए राह आसान नहीं होती।

आख़िरकार इन दोनों दलों में इस तरह की मतभेदों को वजह क्या है! दरअसल जदयू का मानना है कि अल्पसंख्यकों का एक बड़ा वर्ग जदयू का कोर वोटबैंक है। जदयू यह नहीं चाहती कि छोटी सी गलती की वजह से ये वोटबैंक उनसे अलग हो जाए।

कैसा है जदयू का अल्पसंख्यक प्रेम

भाजपा को आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति करने वाली पार्टी माना जाता रहा है। इस पार्टी की उत्थान ही आक्रामक अल्पसंख्यक विरोध की राजनीति से हुआ है। तत्पश्चात भी भाजपा के अनेक फैसले, यथा अनुच्छेद 370 या फिर असम NRC को अल्पसंख्यकों के खिलाफ लिया गया फैसला माना जाता है। लेकिन, आजतक कभी भी जदयू या भाजपा ने गठबंधन तोड़ अपनी अलग राह अलग चलने की नहीं सोची। यह एक अपवाद है कि 2014 लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारी के नाम जदयू भाजपा से अलग हुई थी।

वास्तव में जदयू का अल्पसंखयक प्रेम मात्र वोटबैंक की राजनीति है। जदयू के 15 वर्षों के शासनकाल के बाद भी, राज्य के अल्पसंख्यक आज भी बदतर जीवन जीने को मजबूर है। शिक्षा एवं व्यापार के क्षेत्र में राज्य के अल्पसंख्यक अन्य समुदायों से कई गुना पिछड़ी दिखती है। अशिक्षा के दलदल में फसे होने के कारण यह समुदाय अनेक सकारात्मक कदम नहीं उठा पाती है, जिस कारण इनकी समस्या दिनोदिन जटिल होते जा रही  है।

विपक्ष को मीडिया से दूर रखने की साजिश

सत्ता पक्ष के दोनों दल महत्वपूर्ण मुद्दों पर अलग राय रखते है, जिस कारण विपक्ष द्वारा व्यक्त की गई राय मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पाती है। विपक्ष द्वारा उठाई गई मुद्दों का सुर्खियां न बनने का एक कारण मीडिया का पक्षपातपूर्ण होना भी है। आमजन के हित में विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों का उनके बीच न पहुंचने से ये धारणा बनती जा रही है कि राज्य में शासन तंत्र बेहतर ढंग से काम कर रही है। इसका ख़ामियाजा अंततः आमजन को ही भुगतना पड़ता है।

आखिर किस ओर जा रही है बिहार की राजनीति

हाल-फिलहाल की राजनीति से महागठबंधन की तरफ से तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदिवार मान लिया गया है। ऐसा नहीं है कि महागठबंधन के अन्य नेताओं में मुख्यमंत्री पद की लालसा नहीं है। कभी कभार बिहार कांग्रेस के कुछ चुनिंदा नेता ऐसी बयानबाजी कर ही देते है जो कि राजद के खिलाफ होती है। लेकिन केंद्र में कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व की और से कभी भी इस तरह का बयान नहीं आना महागठबंधन के लिए राहत की बात है।

बिहार में 1990 से पूर्व की राजनीति की चर्चा काफी कम होती है। फिलहाल राजग और महागठबंधन के नेता 1990 से वर्तमान तक की राजनीति पर ही बयानबाज़ी करते नज़र आते है। युवाओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो 1990 से पूर्व की राजनीति से अनजान है। जिस कारण वे सामाजिक न्याय की वास्तविकता नहीं समझ पाते है। यही कारण रही है कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दलों को हाल के लोकसभा चुनाव में मुंह की खानी पड़ी है।  

पिछले 30 वर्षों से राज्य के शीर्ष नेतृत्व में JP आंदोलन से उपजे नेताओं का कब्ज़ा रहा है। इनकी राजनीति कमोबेश एक सी रही है। इनके द्वारा बनाई गई नीतियां भी कुछ मामलो को छोड़कर एक सी ही रही है। 1970 की अवधी के दौरान बिहार में नक्सलबाड़ी आंदोलन के आगमन के बाद से अपराध में अंकुश लगाना एक कठिन सवाल बनते जा रही है। वर्तमान में नितीश कुमार संचालित राजग सरकार को भले ही सुशासन सरकार की उपाधि दी जाती रही हो, लेकिन वास्तविकता यही है कि यह सरकार भी राज्य की कानून व्यवस्था और समावेशी विकास के मामले में पिछड़ी रही है।

राज्य में नरेंद्र मोदी फैक्टर

मोदी-1 में भारतीय जनता पार्टी ताबड़तोड़ राज्य विधानसभा चुनाव जीतते चली गई थी। किसी भी दल के पास मोदी फैक्टर के जवाब में कोई हथियार नहीं था। यह अलग बात है कि 2018 के अंतिम महीनों में विपक्षी दलों को कुछ राज्यों में सफलता मिली थी, लेकिन यहाँ भी वे प्रचंड बहुमत पाने में असफल ही रहे थे। दरअसल नरेंद्र मोदी राज्यों का दौरा काफी कम करते है। जिस राज्य में चुनाव हो वहां का दौरा उनके द्वारा पूरी तरह बंद कर दी जाती है।

चुनाव के समय मोदी का अचानक आक्रामक रूप से प्रकट होने से विपक्ष के नेता भौचक्के रह जाते है। ऐसा नहीं है कि विपक्षी नेताओं द्वारा जवाबी हमले नहीं किए जाते है। लेकिन विपक्ष के नेताओं को मुख्यधारा की मीडिया द्वारा न के बराबर कवरेज मिलने से उनका सारा किया धरा बेकार ही रह जाता है। साथ ही भाजपा की काफी मजबूत एवं आक्रामक IT सेल अपने नेताओं के सन्देश को समाज के अंतिम छोड़ पर खड़े मतदाता तक आसानी से पहुंचा देती है। आमजन से सीधे जुड़ने में आरएसएस के स्वयंसेवक भी भाजपा कार्यकर्ताओं को काफी मदद पहुँचाते है।

क्या नए एवं युवा नेता तेजस्वी यादव बनेंगे बिहार के मुख्यमंत्री

राज्य में आज भी युवावर्ग को नेतृत्व प्रदान करते नेताओं की कमी दिखती है। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 की राजनीति अधिकतर राजद के 15 साल बनाम राजग के 15 साल के इर्दगिर्द घूमती नज़र आती है। इन सब वजहों से राज्य के वास्तविक मुद्दे कही न कही गायब होती दिख रही है। एक बड़ी बाजार होने के बावजूद राज्य में उद्योगों का विकास न होना आधुनिक युवावर्ग के लिए परेशानी की सबब बनते जा रही है। वर्त्तमान युवावर्ग अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक नज़र आ रही है। इनका रोजगार और अन्य आवश्वकताओं के लिए पलायन जारी रहने से, इनमे सत्ता के प्रति आक्रोश पैदा होती जा रही है। अन्य प्रदेशों के विकास से अपने राज्य की विकास की तुलना करने पर ये वर्ग खुद को ठगा महसूस करता है।

बिहार की अनेक समस्याएं आज भी समाधान की बाँट जोह रही है। राजनेताओं द्वारा अपने पास जादू की छड़ी न होने की बात कहना भी आमजन को हतोत्साहित कर रही है। एक तरह से बिहार की राजनीति जयप्रकाश आंदोलन के नारों से आगे आजतक नहीं बढ़ पाई है। बात चाहे किसी भी दल की हो, बिहार की राजनीति में सभी दलों के शीर्ष नेतृत्व में जयप्रकाश आंदोलन से चमके नेतागण ही कब्ज़ा किए हुए है। पिछले 30 सालो से ये सत्तासीन रहे है, जिस कारण बिहार नेतृत्व की नई एवं आधुनिक शैली से अनजान रही है। ऐसे में बिहार एक पूर्णतः नए कलेवर के नेतृत्व की बाँट जोह रही है।

अन्य अनेक कारणों से, राज्य की जनता में एक नए मुख्यमंत्री की चाहत बलवती होती जा रही है। ऐसा स्पष्ट होती दिख रही है कि राज्य की जनता सामाजिक न्याय एवं सम्पूर्ण क्रांति से उपजे नेताओं को दरकिनार कर बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में पूर्णतः एक नए विचार को अपना नेता के रूप में देखना चाहती है।

राज्य में युवा नेतृत्व की चाह

राज्य में युवा नेतृत्व की बात करें तो फिलहाल तेजस्वी से बेहतर अन्य कोई भी युवा दूर-दूर तक नहीं दिखते। तेजस्वी यादव बिहार के जनता की कठिनाइयों के साथ खड़े दिख रहे है। उन्होंने राज्य की हरेक छोटे-बड़े मामले को बखूबी उठाकर नेता प्रतिपक्ष की जवाबदेही को भलीभाँती पूरा किया है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण मुजफ्फरपुर बालिका गृह काण्ड है। इस सांस्थानिक अपराध की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच तेजस्वी यादव के कड़े प्रतिरोध के फलस्वरूप ही हो सकी है। साथ ही सृजन एवं अन्य मामलो में तेजस्वी यादव के कड़े प्रतिरोध के कारण ही सरकार को झुकना पड़ा है। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि विनम्र एवं मिलनसार स्वभाव के तेजस्वी ने अपने पिता की अनुपस्तिथि में पार्टी को बखूबी संभाला है। हाल ही में राजद द्वारा आरम्भ अतिपिछड़ा वर्ग को पार्टी में अधिक से अधिक जोड़ने की कवायद विरोधियों में खलबली मचाती नज़र आती है।

पिछले दिनों, पटना जंक्शन के पास दूध मंडी तोड़ दी गई। कहा गया कि इस जमीन का उपयोग जंक्शन के सौंदर्य को बढ़ने के लिए किया जाएगा। यह मंडी विशेष रूप से यादव समूह से जुडी हुई थी। तेजस्वी इसका विरोध करने पहुंचे थे, लेकिन अपने वोटबैंक से अधिक राज्य के बेहतरी को तरजीह दी और धरना वापस ले लिया। इस तरह की घटना यदि किसी अन्य पार्टी के वोटबैंक से हुई होती तो एक तूफ़ान सा खड़ा हो उठता, लेकिन तेजस्वी ने एक बेहतरीन उदाहरण पेश करते हुए सरकार के फैसले का समर्थन करने का फैसला लिया।  ऐसी अनेक घटनाए साबित करती है कि राजनीति में नए होते हुए भी तेजस्वी यादव लगातार पुराने मंझे हुए खिलाडियों से लड़ते हुए बिहार की राजनीति ओर जनआकांक्षाओ को एक नई मंज़िल की राह दिखा रहे है।