बुधवार, फ़रवरी 28, 2024
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बिहार की गिरती शिक्षा व्यवस्था – कारण और निदान!

एक समय विश्व को ज्ञान की पाठ पढ़ाने वाली, विश्व को नालंदा और विक्रमशिला जैसी अतुलनीय विश्वविद्यालय देनेवाली बिहार की धरा में शिक्षा के हालात आज अतिचिन्तनीय हो गई हैं। चारों तरफ बिहार के शिक्षा व्यवस्था के सूरते-हाल पर बदनामी तेजी से फैलती जा रही है। बिहार के एक नागरिक के नाते व्यक्तिगत तौर पर मैं भी दुखी हूँ। मैं चाहूंगा, बिहार के लोग इस सवाल को गंभीरता से ले।

सच पूछा जाय तो आज़ादी के बाद से ही शिक्षा की चुनौतियों पर हमने ध्यान नहीं दिया। पहले शिक्षा मंत्री से अबतक के शिक्षा मंत्रियों को ध्यानपूर्वक देखिये – बद्रीनाथ वर्मा,सत्येंद्र नारायण सिंह से लेकर आज तक के शिक्षा मंत्री को। इनमे कुछेक को छोड़कर सबने शिक्षा के स्तर को गिराया। कर्पूरी जी के अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करने के फैसले कालांतर में आत्मघाती साबित हुए। इससे आधुनिकता के दौर में बिहारवासियों का अंग्रेजी के प्रति रुझान कम हुआ।

सरकार की कुव्यवस्था

एक वर्ग ये भी मानते है कि अँग्रेजी के अनिवार्यता समाप्त होने से बहुजनवर्ग की रुझान शिक्षा की ओर तेज हुआ। लेकिन गहन अध्ययन करने पर हम पाते है कि इससे खासकर बहुजन और अल्पसंख्यक समाज अँग्रेजी को छोड़ते गए। परिणामतः वे आधुनिकता की मुख्यधारा से दूर होते चले गए। आज लगभग सभी क्षत्रों में अंग्रेजी की ज्ञान अनिवार्य है। इसके बिना आपकी अच्छे नौकरी की कल्पना करना असंभव सा ही हैं। अतः कर्पूरीजी का अँग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करना वर्ग विशेष के लिए नुकसानदेह ही रही है।

रामराज सिंह ने गुणवत्ता विकसित करने की कुछ हद तक कोशिश की। यहाँ केदार पाण्डे सरकार के कार्यकाल में परीक्षाओं के रिजल्ट की समीक्षा करना अतिआवश्यक हैं। इनके समय उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या कहीं -कहीं दस प्रतिशत भी नहीं थे। इसी कुव्यवस्था ने जयप्रकाश आंदोलन की पीठिका तैयार कर दी। आनेवाले दिनों में जयप्रकाश आंदोलन का यदि ईमानदार अध्ययन हुआ तब यह निष्कर्ष भी आएगा कि इस आंदोलन में अस्सी फीसदी बहुजन वर्ग के पीड़ित छात्र थे। हालांकि उस आंदोलन का मुख्य नारा शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन और भ्रष्टाचार विरोध था, लेकिन यह हकीकत है बिहार का सबसे ईमानदार मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर खान उसी वक़्त काम कर रहे थे।

“एक रिपोर्ट के अनुसार 2005 में नियुक्ति किए गए हाई स्कूल शिक्षकों में से 90 फीसदी शिक्षकों को अपने विषय का ज्ञान ही नहीं है। वहीं पहले से कार्यरत स्कूल शिक्षकों सहित हाई स्कूल के शिक्षकों में से 50 फीसदी शिक्षक सिफारिश पर जॉब कर रहे हैं। दूसरी ओर कुछ अच्छे शिक्षक हैं, वो पढ़ाना नहीं चाहते। ऐसे में वहां कोचिंग संस्थानों की भरमार लगी है, जिनका उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना रह गया है।”

बुनियादी जरूरतों का अभाव

बिहार में शिक्षकों और स्कूल-भवन संबंधी बुनियादी जरूरतों का अभाव सबसे बड़ी रुकावट है। राज्य के स्कूलों में शिक्षकों के पढ़ाने और छात्रों के सीखने का स्तर अभी भी नीचे है। सरकारी प्राइमरी स्कूलों में इन्फ्रास्ट्रकचर यानी बुनियादी जरूरतों वाले ढांचे का घोर अभाव यहां स्कूली शिक्षा की स्थिति को कमजोर बनाए हुए है। दूसरी बात ये कि शिक्षकों और खासकर योग्य शिक्षकों की अभी भी भारी कमी है। जो शिक्षक हैं भी, उनमें से अधिकांश स्कूल से अक्सर अनुपस्थित पाए जाते हैं। निरीक्षण करने वाले सरकारी तंत्र और निगरानी करने वाली विद्यालय शिक्षा समिति के निष्क्रिय रहने को इस बदहाल शिक्षा-व्यवस्था का तीसरा कारण माना गया है।

शिक्षकों की कमी, बच्चों का हड़ताल, यही है नितीश कुमार का बिहार

बिहार के स्कूलों में शिक्षकों के पढ़ाने और बच्चों के सीखने का स्तर, गुणवत्ता के लिहाज से बहुत नीचे है। एक तरफ बिहार का गौरवशाली शैक्षणिक अतीत है और दूसरी तरफ आज इस राज्य का शैक्षणिक पिछड़ापन। ये सचमुच बहुत कचोटने वाला विरोधाभास है। पिछले एक दशक में बिहार में साक्षरता वृद्धि की दर 17 प्रतिशत होने को रिपोर्ट में शुभ संकेत माना गया है। लेकिन इस साक्षरता वृद्धि के बावजूद बिहार में साक्षरता का प्रतिशत 63.8 तक ही पहुंच पाया है, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे कम है।

शिक्षा प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह

“बिहार सरकार वयस्क साक्षरता, खासकर स्त्री-साक्षरता बढ़ाकर प्राथमिक शिक्षा के प्रति ग्रामीण जनमानस में ललक पैदा कर सकती है। विश्लेषक मानते हैं कि राज्य में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर जाली या परीक्षा में नकल से प्राप्त डिग्री-सर्टिफिकेट वाले अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति का ग्रहण लग चुका है।”

बोर्ड परीक्षा में चल रही खुलेआम नकल से प्रदेश की शिक्षा प्रणाली पर भी प्रश्नचिन्ह लग गया है। अब तो लोग सवाल उठाने लगे हैं कि क्या बिहार में लोग ऐसे ही आईएस और आईपीएस बनते हैं? बर्ष बोर्ड परीक्षा में भी हो रही धांधली ने राज्य सरकार की कलई खोल दी है। इन सभी प्रश्नों ने देश के शिक्षाविदों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

बिहार बोर्ड परीक्षा में हो रही नकल के लिए जिम्मेदार केवल सरकार ही नहीं, बल्कि अभिभावक भी हैं। सभी का सपना होता है कि उनका बच्चा हर परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करे। यह सपना कोई बुरा नहीं है। इस परीक्षा में तो छात्रों के अभिभावक ही नकल करा रहे हैं। छात्र भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। बिहार में पैसे और पैरवी के बल पर टॉपर बनवाने की बात आम हो गई हैं। इस तरह की घटनाएं न सिर्फ बिहार की शिक्षा व्यवस्था, बल्कि प्रतिभा को भी बदनाम करती हैं।

शिक्षा व्यवस्था के सुधार के विषय पर आपकी क्या राय है नीचे कमेंट में अवश्य बताएं।

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