गुरूवार, फ़रवरी 29, 2024
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सीएम के तथाकथित विकास पर प्रशांत किशोर ने दागा सवाल, कहा पिच्छलग्गु

चुनावी रणनीतिकार व जदयू के पूर्व उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर जदयू से अलग होने के बाद आज पहली बार पटना पहुंचे और मीडिया से रुबरु हुए। आज के प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीके ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए कहा कि बिहार को किसी पिछलग्गू नेता की नहीं, बल्कि एक मजबूत नेता की जरूरत है जो अपने फैसले खुद ले सके।

प्रशांत किशोर सीएम नीतीश को लेकर एक बड़ी बात कही, उन्होंने कहा, अगर आपके किसी के आगे झुकने से भी बिहार का विकास हो रहा है, तो मुझे आपत्ति नहीं है। क्या इस गठबंधन के साथ रहने से बिहार का विकास हो रहा है? सवाल यह है कि इतने समझौते के बाद भी बिहार में इतनी तरक्की हो गई है? क्या बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिला?’

पीके सीएम नीतीश को पितातुल्य

प्रशांत किशोर ने कहा कि वो दिसंबर 2014 में पहली बार नीतीश कुमार से मिले थे, और जिस तरह से नीतीश जी ने मुझे अपने साथ रखा, वैसे एक पिता ही ध्यान रख सकते हैं। उन्होंने मेरा ध्यान अपने बेटे की तरह रखा, बहुत स्नेह दिया। जब मैं उनकी पार्टी में था, तब भी और उससे पहले भी, तो मैंने भी उन्हें पितातुल्य ही माना है।’

बिहार की नीतीश सरकार के कामकाज पर उठाया सवाल

उन्होंने बिहार में पिछले 10 से 12 वर्षो में किये गए काम का हवाला देकर नीतीश सरकार के काम पर सवाल उठाते हुए प्रशांत ने कहा कि आज भी बिहार वहीं है जहां पिछले 15 वर्षों से था। ऐसा नहीं कि बिहार में विकास का काम नहीं हुआ है, लेकिन जैसा हो सकता था, वैसा काम नहीं हो सका।
‘बात बिहार की’ नाम से पीके एक कैंपेन शुरु करेंगे

विदित हो कि पीके अपनी बात का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि ‘मैं ना तो यहां किसी राजनीतिक पार्टी का ऐलान करने आया हूं और ना ही किसी गठबंधन के काम में मेरी कोई दिलचस्पी है। मैं बिहार में नया कैंपेन शुरू कर रहा हूं, जिसका नाम होगा बात बिहार की। यह कैंपेन 20 फरवरी से शुरु होगा. मेरा लक्ष्य सिर्फ एक है, ‘बिहार की तस्वीर को बदलना’। उन्होंने कहा कि सभी साढ़े आठ हजार पंचायत के करीब दस लाख युवा बिहार बदलाव के कार्यक्रम में शामिल होंगे। इसी क्रम में किशोर ने एक आंकड़ा जारी कर बिहार में पिछले 15 वर्ष के विकास की तुलना भी की।

बता दें कि विकास की बात से इतर पीके ने यह भी कहा कि नीतीश कुमार को यह तय करना होगा कि वो किसके साथ हैं। एक तरफ तो वे कहते हैं कि बापू-जेपी-लोहिया के आदर्शों को नहीं छोड़ सकते हैं। वहीं, दूसरी तरफ वे गोडसे को मानने वाले लोगों के साथ खड़े होते हैं, ऐसा कैसे हो सकता है? बापू और गोडसे साथ नहीं चल सकते।

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